१. ग्रन्थ रचनाकार- कौटिल्य
२. समय- ई. पू. तृतीय सदी
३. विभाजन- १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० प्रकरण
४. मंगलवचन- नमः शुक्रबृहस्पतिभ्याम्।
५. अध्यायों में नाम- वि अधर्म कण्टक योग मषाव्यसनभिसाङ्ग्रमिकाः (ट्रिक)
१. विनयाधिकार- विद्या, इन्दियजय, अमात्यनियुक्ति, मन्त्री पुरोहित नियुक्ति, गुप्तचरनियुक्ति, मन्त्राधिकार, राजकुमार व्यवहार
२. अध्यक्ष प्रचार- जनपद स्थापना, दुर्ग निर्माण, परीक्षा, अध्यक्ष
३. धर्मस्थनिय- विवाह सम्बन्ध, दायविभाग, पुत्रविभाग, दण्डपारुष्य, वाक्पारुष्य, ऋण
४. कण्टकशोधन- प्रजा रक्षा, चौरी
५. योगवृत्त- दण्डव्यवस्था, कोष संग्रह
६. मण्डलयोनि- प्रकृतियों के गुण
७. षाड्गुण्य-
८. व्यसनाधिकारिक- व्यसन
९. अभियास्यत्कर्म- आक्रमण, आपत्तियाँ
१०. साङ्ग्रमिक- छावनी निर्माण, सेना उत्साह, व्यूह
६. अर्थशास्त्र को चरणव्यूह (शौनक) ने अथर्ववेद का उपवेद कहा है।
७. मनुष्याणां वृत्तिरर्थः, मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः तस्या पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रम् इति। १५/१
८. आन्वीक्षकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति विद्याः।
९. त्रयी, वार्ता, दण्डनीतिश्चेति मानवाः। त्रयीविशेषो ह्यान्वीक्षकीति।
१०. वार्ता दण्डनीतिश्चेति बार्हस्पत्याः। संवरणमात्रं हि त्रयी लोकयात्राविद इति।
११. दन्डनीतिरेको विद्येत्यौशनसाः। तस्यां हि सर्वविद्यारम्भाः प्रतिबद्धा इति।
१२. चतस्र एव विद्या इति कौटिल्यः। ताभिर्धर्मार्थौ यद्विद्यातद्विद्यानां विद्यात्वम्॥
१३. सांख्यं योगो लोकायतं चेत्यान्वीक्षकी। धर्माधर्मौ त्रय्यामर्थानर्थौ वार्तायां नयापनयौ दण्डनीत्याम्। बलाबले चैतासां हेतुभिरन्वीक्षमाणान्वीक्षकी लोकस्योपकरोति, व्यसनेऽभ्युदये च बुद्धिमवस्थापयति, प्रज्ञावाक्यक्रियावैशारद्यं च करोति।
१४. प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्। आश्रयःसर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षकी मता॥
१५. साम-ऋग्-यजुर्वेदास्त्रयस्त्रयी।
१६. अथर्ववेदेतिहासवेदौ च वेदाः।
१७. शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोविचितिर्ज्योतिषमिति चाङ्गानि।
१८. ब्राह्मण कर्म-६ अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना, याजन, दानदेना, दान लेना
१९. क्षत्रिय कर्म-५ अध्ययन, यज्ञ करना, दान देना, शस्त्रबल से जीविका चलाना, प्राणियों की रक्षा
२०. वैश्यकर्म-७ अध्ययन, यज्ञ करना, दान देना, कृषिकार्य, पशुपालन, व्यापार
२१. शूद्र कर्म-१ सेवा करना
२२. कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता। धान्यपशुहिरण्यकुप्यविशिष्ट प्रदानादौपकारिकी। तया स्वपक्षं परपक्षं च वशीकरोति कोशदण्डाभ्याम्।
२३. आन्वीक्षकी त्रयी वार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः। तस्यनीतिर्दण्ड नीतिः। अलब्धलाभार्था, लब्धपरिरक्षिणी, रक्षितविवर्धनी, वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादिनी च।
२४. तस्माल्लोकयात्रार्थी नित्यमुद्यतदण्डः स्यात्। न ह्येवं विधं वशोपनयनमस्ति भूतानां यथा दण्ड इत्याचार्याः।
२५. नेति कौटिल्यः।..............सुविज्ञात प्रणीतो हि दण्डः प्रजा धर्मार्थकामैर्योजयति।
२६. कृतकः स्वाभाविकश्च विनयः। विनय=शिक्षा
२७. वृत्तोपनयनस्त्रयीमान्वीक्षकीं च शिष्टेभ्यः। वार्तामध्यक्षेभ्यः, दण्डनीतिं वक्तृप्रयोक्तृभ्यः।
२८. ब्रह्मचर्यं चाषोडशाद्वर्षात्।
२९. राजा की दिनचर्या-
दिन का प्रथम भाग- हाथी, घोडा, रथ, शस्त्र आदि विद्याओं की शिक्षा
दिन का दूसरा भाग- इतिहासादि का श्रवण, अवशिष्ट समय में नये ज्ञान का अर्जन
३०. पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतितिहासः।
३१. इन्द्रियलोलुप राजाओं के उदाहरण
काम- भोजवंशीय दाण्डक्य-ब्राह्मण कन्या अपहरण
काम- विदेहराज कराल-
क्रोध- जनमेजय- ब्राह्मणों से कलह
क्रोध- तालजंघ- भृगुवंशियों से कलह
लोभ- पुरुरवा- धनापहरण
लोभ- सौवीर देशीय अजबिन्दु- धनापहरण
मोह- रावण- परपत्नी मोह
मोह – दुर्योधन- राज्य मोह
मद- डम्भोद्भव- प्रजा तिरस्कार- नारायण द्वारा मारा गया
मद- हैहयराज अर्जुन- मद युक्त- परशुराम के हाथ मारा गया
हर्ष- वातापि नामक असुर- अगस्त्य ऋषि के साथ वञ्चना
हर्ष- यादवसंघ- द्वैपायन ऋषि से कपट करने पर
३२. अर्त एव प्रधान इति कौटिल्यः अर्थमूलौ हि धर्मकामाविति।
अमात्यनियुक्ति-
३३. भारद्वाज- सहाध्यायिनोऽमात्यान् कुर्वीत
३४. विशालाक्ष- ये ह्यस्य गुह्यसधर्माणस्तानमात्यान् कुर्वीत,
३५. पराशर- य एनमापत्सु प्राणाबाधकयुक्तास्वनुगृहणीयुस्तानमात्यान् कुर्वीत दृष्टानुरागत्वादिति।
३६. पिशुन- संख्यातार्थेषु कर्मसु नियुक्ता ये यथादिष्टमर्थं सविशेषं वा कुर्युस्तानमात्यान् कुर्वीत दृष्टगुणत्वादिति।
३७. कौणपदन्त-पितृपैतामहानमात्यान् कुर्वीत्
३८. वातव्याधि- नीतिविदो नवानमात्यान् कुर्वीत।
३९. बाहुदन्तीपुत्र- अभिजनप्रज्ञाशौचशौर्यानुरागयुक्तानमात्यान् कुर्वीत, गुणप्राधान्यादिति।
४०. कौटिल्य- सर्वमुपन्नमिति कौटिल्यः। कार्यसामार्थ्यादिति पुरुषसामार्थ्यं कल्पते सामर्थ्यतश्च।
४१. प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः। स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम्। परोपदिष्टं परोक्षम्। कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम्।
४२. अमात्य परीक्षा- धर्मोपधा, अर्थोपधा, कामोपधा, भयोपधा
४३. धर्मोपधा- धर्मस्थानीय, कन्तकशोधन
४४. अर्थोपधा- समाहर्ता, सन्निधाता
४५. कामोपधा- बाह्याभ्यन्तरविहाररक्षक
४६. भयोपधा-अंगरक्षक
४७. सर्वोपधा शुद्धान् मन्त्रिणः कुर्यात्
४८. सर्वत्राशुचीन् खनिद्रव्यहस्तिवनकर्मान्तेषूपयोजयेत्
४९. मन्त्री- मनु-१२, बृहस्पती-१६, शुक्राचार्य-२०, कौटिल्य- सामर्थ्यानुसार
५०. दूत तीन- निसृष्टार्थ, परमितार्थ, शासनहार
५१. गूढपुरुष दो प्रकार- संस्था तथा संचार
५२. संस्था गूढपुरूष ५ प्रकार के होते-कापटिक, उदास्थित, गृहपति, वैदेहक, तापस
५३. संचार गूढपुरूष- सत्री, तीक्ष्ण, रसद, परिव्राजिका, मुण्डा, वृषली
५४. कापटिक- विद्यार्थी
५५. उदास्थित- सन्यासी
५६. गृहपतिक- कृषक
५७. वैदेहक-वणिक
५८. तापस-तपस्वी
५९. दुर्ग चार- औदक, पार्वत, धान्वन, वनदुर्ग
६०. सेना चार प्रकार की- पैदल, हाथी, घोडा, रथ
६१. उपाय चार- साम, दान, दण्ड, भेद
६२. वाक्पारुष्य ५ प्रकार- शरीर, प्रकृति, श्रुत, वृत्ति, देश
६३. अर्थशास्त्र में कौटिल्य का मत ८० बार आया है।
६४. दिन के भाग आठ होते है।
६५. कोषक्षय के कारण आठ होते है।
६६. विवाह आठ प्रकार के होते है।
१. कन्यादानं कन्यामलङ्कृत्य ब्राह्मो विवाहः।
२. सहधर्मचर्या प्राजापत्यः।
३. गोभिथुनादानादार्थः।
४. अन्तर्वेद्यामृत्विजे दानाद् दैवः।
५. मिथस्समवायद् गान्धार्वः।
६. शुल्कदानादासुरः।
७. प्रसभ्यादानाद् राक्षसः।
८. सुप्तादानात् पैशचः।
६७. सात प्रकृतियाँ
६८. स्त्रीधन दो प्रकार का- वृत्ति तथा आवध्य
६९. १२ मण्डल
७०. ब्याज की स्थिति
१. सामान्यरूप से १०० पर सवा पण
२. व्यापारी- १०० पर ५ पण
३. जंगल व्यापारी-१०० पर १० पण
४. समुद्र व्यापारी- १०० पर २० पण
७१. पितृभक्त से हीन राजकुमार
१. भारद्वाज- विनाश
२. विशालाक्ष- कैद
३. पराशर- दुर्ग में कैद
४. पिशुन- पडोसी राज्य के दुर्ग में
५. कोणदन्त- वत्सस्थान (ननिहाल)
६. कौटिल्य- व्यसन में लगाना
७२. राजपुत्र की तीन श्रेणियाँ- बुद्धिमान्, आहार्यबुद्धि, दुर्बुद्धि
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